सँवर के चली गोरी
साज-सज्जा, चंचल मन और मिलन की ओर बढ़ते कदम - यह कविता प्रेम के उस कोमल क्षण को चित्रित करती है जहाँ गोरी चंदा को छूने चले चकोर जैसी आकांक्षा लेकर साजन की ओर बढ़ती है।
इधर जाऊँ या उधर जाऊँ
चाहत की दो राहों के बीच खड़ा मन, जो अंततः चयन से आगे बढ़कर मुक्ति की राह खोजता है।
