इधर जाऊँ या उधर जाऊँ

मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ,
तुम ही कहो, मैं किधर जाऊँ।

तुम गंगा हो, वो कालिंदी,
तुम पावन हो, वो आनंदी।
तुम बेला हो, वो सूरजमुखी,
तुम जीवन हो, उससे जीवन सुखी।
बताओ, मैं क्या पाऊँ,
मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ।

तुम हीरा हो, वह कंचन है,
तुम हृदय हो, वो आँचल है।
तुम मृदुभाषी, वो अभिलाषी,
तुम प्रेम हो, वो प्रेयसी।
बताओ, मैं किसे चाहूँ,
मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ।

तुम संपूर्ण हो, तो वो आधा है,
तुम रुक्मिणी, तो वो राधा है।
तुम मधु हो, वो मधुशाला है,
तुम रस हो, वह रसप्याला है।
बताओ, मैं क्या लाऊँ,
मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ।

तुम जोग हो, तो वो जोगिनी है,
तुम पुष्प-कली, तो वह मालिन है।
तुम मंगल हो, तो वह शीतल है,
तुम संवेदना हो, तो वह कोमल है।
बताओ, मैं किसे बुलाऊँ,
मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ।

तुम सौभाग्य हो, वो लक्ष्मी है,
तुम संसार हो, वह रागिनी है।
तुम चाँदनी हो, तो वो चकोरी है,
तुम पुस्तक हो, तो वो कोरी है।
बताओ, मैं किस ओर जाऊँ,
मैं इधर जाऊँ या उधर जाऊँ।

गंगा तो मिले, पर कालिंदी न खोऊँ,
बेला भी मिले, पर सूरजमुखी न खोऊँ।
हीरे की भी चाह मुझे,
और कंचन की भी चाह।
हे मेरे प्रभु, दिखाओ कोई राह।
मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ,
क्यों न बैरागी बन जाऊँ।

न इधर जाऊँ, न उधर जाऊँ,
बस यहीं पर मुक्ति पा जाऊँ।

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