सँवर के चली गोरी

सँवर के चली गोरी साजन की ओर,
जैसे चंदा को छूने चला हो चकोर।

लट बिखरा के, टीका सजा के,
बिंदिया लगा के, काजल बिखरा के,
चुनरी लहरा के, बिछुआ पहन के,
पायल पहन के, चूड़ी खनका के,
बाँध चली आँचल में प्रीत की डोर,
जैसे चंदा को छूने चला हो चकोर।

कली सी खिली, कोयल सी चहकी,
नशे में जैसे बहकी, कली जैसे महकी।
धड़कन की ताल पे थिरकी,
हवा में जैसे फिरकी।
बाग-बगीचे लगे अपने,
आँखों में सजाए सपने।
बस में आज नहीं उसके मन का मोर,
जैसे चंदा को छूने चला हो चकोर।

पायल जो खनकी, थोड़ा सकुचाई,
ज़रा सी रूठी, पलक झपकाई।
छवि अपनी देखी, थोड़ा सा शर्माई,
कपोल भी हिले, पर कुछ कह न पाई।
साँवरी सी सूरत पर लालिमा गहरी,
प्रेम के सागर में हुई सराबोर,
जैसे चंदा को छूने चला हो चकोर।

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