अपने हिस्से का जीवन

कितनी लहरें उठती हैं

और बिखर जाती हैं

सुबह से शाम होने में।

चाहा तो था कुछ हासिल करना,

पर जीवन लगा दिया

सब खोने में।

घर-परिवार छूटा,

देश और समाज छूटा,

कुछ खुशियाँ छोड़ दीं,

कुछ नए सुख बोने में।

क्या मिला, क्या खोया,

यही खाता बनाते रहे।

एक पल को भी न रुके,

अश्रु भी रह गए

आँखों के कोने में।

रातें अधूरी नींदों में गुज़रीं,

दिन और साल यूँ दौड़ाते रहे।

न होश रहा, न जोश रहा,

बस उलझे रहे

जीवन-चक्र के फेरों में।

खुशियों के प्यारे से पल भी थे,

और ज़िम्मेदारियों का एहसास भी।

आभास ही नहीं हुआ,

कब खुद को खो दिया

सबको संजोने में।

एक चाहत बाकी है,

अपने ख़्वाबों को पंख लगाकर

ऊँचे आसमान में उड़ाएँ।

हमारा भी तो हक़ बनता है,

आख़िरी मंज़िल से पहले

अपने हिस्से का जीवन

अपने नाम लिखाएँ।

कितनी लहरें उठती हैं

और बिखर जाती हैं

सुबह से शाम होने में।

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